अतीत के झरोखों से ! एक था गौणा ताल : जाने कब बदलेगी तस्वीर

अतीत के झरोखों से ! एक था गौणा ताल : जाने कब बदलेगी तस्वीर

  • संजय चौहान

सीमांत जनपद चमोली में बिरही से लगभग १५ किमी दूर एक सुन्दर और प्यारी से घाटी है निजमुला घाटी। आज से ५० बरस पहले कभी इस घाटी की अलग ही रौनक थी लेकिन आज वहां वीरानी के सिवा कुछ नहीं। क्योंकि आज से ठीक 48 बरस पहले वहां पर एक बेहद ही सुन्दर और नयनाभिराम गौणा ताल मौजूद था।

जहाँ पर लोग ताल की सुन्दरता का लुत्फ़ उठाने जाया करते थे। यह ताल खूबसूरत ताल चार किमी लंबा, एक किमी चौड़ा और 300 मीटर गहरा था जिसमें गौणा करीब 15 करोड़ घन मीटर पानी था। लेकिन २० व २१ जुलाई १९७० को नंदा घुंघटी पर्वत पर भारी बारिश और बादल फटने से एक साथ ढाक नाला तपोवन जोशीमठ, पातळ गंगा, और बिरही नदी में भयंकर बाढ़ आ गई थी जिस कारण से बिरही ताल टूट भी गया था। इसी दिन पीपलकोटी के निकट बेलाकुची कस्बा भी हमेशा हमेशा के लिए नेस्तनाबूत हो गया था।

ताल टूटने के बाद भारी मात्रा में पानी बिरही की संकरी घाटी से होते हुए चमोली, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, ऋषिकेश और हरिद्वार की ओर बढा जिसने भारी व्यापक तबाही मचाई थी। दस्तावेजों के मुताबिक उस भारी जल प्रवाह से भले ही अलकनंदा घाटी में खेती और संपत्ति को भारी नुकसान हुआ था लेकिन मौत सिर्फ एक हुई थी। वह भी उस साधु की जो लाख समझाने के बावजूद जलसमाधि लेने पर अड़ा हुआ था।

आपदा प्रबंधन की मिशाल है गौणा ताल!

बिरही नदी और आपदाओं का लम्बा इतिहास रहा है। 1700 से लेकर 1970 के बीच इस घाटी मे कई बार भारी भूस्खलन और आपदाओं नें घाटी सहित निचले स्थानों में बसे कस्बों को भारी नुकसान पहुंचाया। श्रीनगर शहर तो बिरही ताल से कई बार नेस्तानाबूत हुआ। बिरही ताल बनने के बाद से ही अंग्रेजो नें इसके बचाव और नुकसान का आंकलन कर तैयारी कर दी थी। अंग्रेज तुरंत सूचना भेजने और लोगों को चौकन्ना करने की व्यवस्था की अहमियत समझते थे इसलिए उन्होंने तब यहां पर दुर्लभ मानी जाने वाली लगभग 100 मील लंबी तार लाइन भी बना ली थी। और ताल के किनारे दुर्मी गाँव में एक तारघर खोल दिया था तारघर से एक अंग्रेज कर्मचारी हर रोज पानी के स्तर की जानकारी नीचे बसे गांवों में भेजता था। संकट को समझने और उससे बचने के लिए उस समय पर सटीक उपाय करने की अंतर्दृष्टि दिखाई गई थी जिस कारण बिरही ताल टूटने के बाद जनहानि बहुत कम हुई थी। सरकार को गौणा ताल के आपदा प्रबंधन से सीख लेनी चाहिए ताकि केदारनाथ आपदा जैसी पुनरावृत्ति प्रदेश में दुबारा न हो सके।

उस घटना को आज 48 बरस गुजर जाने को है लेकिन नीति नियंताओ ने इस ताल की कभी भी सुध नहीं ली। ताल का टूट जाना इस घाटी के लिए ये किसी अभिशाप साबित हुआ। इस घाटी के लोग कई बरसो से इस ताल को पुनः विकसित कर इसे पर्यटन मानचित्र पर लाने की मांग करते आ रहे है लेकिन सरकारे हमेशा कोरे आश्वाशानो का झुनझुना थमा देती है।

वास्तव में बरसो से उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश बनाने का सपना देखा जा रहा है ऐसे में यदि हमें इसको पर्यटन प्रदेश के रूप में विकसित करना है तो ऐसे स्थानों के लिए नई योजना बनाकर धरातल पर उतारना पड़ेगा तभी हम इस प्रदेश को आगे की पंक्ति में ले जा सकेंगे ।

  • GROUND 0

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