…तुमने देखी वो महिला कंडक्टर

…तुमने देखी वो महिला कंडक्टर

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  • कुमार दुष्यंत 

सुबह रूडकी से हरिद्वार आना था।बस में चढ़ा और कंडक्टर की खाली सीट देखकर वहीं बैठ गया। इतने में जींस, जैकेट पहने व बगल में बैग लटकाए एक कुलीन सी दिखने वाली युवती बगल में आकर बैठ गई।मुझे लगा कि कंडक्टर की सीट पर एक ही आदमी बैठ सकता है, इसलिए मुझे इस सीट से उठ जाना चाहिए।लेकिन, इससे पहले कि मैं सीट से उठता वह बोल पड़ी.. “आप कहां जाएंगे?”

मैं भोंचक-सा रह गया!! और कहा “ह.. हरिद्वार!”
इतने में उसने बगल के बैग से टिकट मशीन निकाली और बत्तीस रुपए का टिकट मुझे थमा दिया।
विदेशों में तो यह बात आम है। वहां लड़कियां कडंक्टर ही नहीं हैं, बल्कि बसें भी चलाती हैं।लेकिन हमारे देश में अभी यह माहौल नहीं है।लेकिन आज उस युवती को परफेक्शन के साथ पुरुषों वाला काम करते देख अच्छा लगा।एक वक्त था जब महिलाएं घरों की देहरी तक ही सीमित थीं।लेकिन आज वह पुरुषों के साथ हर मोर्चे पर कदमताल कर रही हैं।एक विकसित देश के लिए यह जरूरी भी है।अब सोच के साथ-साथ परिदृश्य भी बदल रहा है।

  •  पेशे से पत्रकार कुमार दुष्यंत की फेसबुक वॉल से साभार

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