बेटी नंदा की कैलाश विदाई पर बहा आंसुओ का सैलाब

बेटी नंदा की कैलाश विदाई पर बहा आंसुओ का सैलाब

जै मां नंदा
  • चमोली से संजय चौहान की रिपोर्ट

 जी हाँ आप भी चौंका गये होंगे की अषाड के महीने माँ नंदा की कैसी विदाई नंदा की विदाई तो भादो के महीने होती है। लेकिन ये सच है। जनपद चमोली के कडाकोटपट्टी के नो गांवों द्वारा् प्रत्येक तीसरे साल आषाढ़ माह के नन्दा अष्टमी मे भारकोट बार भंगोटा में 3 दिनों का नन्दा देवी मेले का आयोजन किया जाता है। कुछ समय पहले यहाँ चोसठ (64) बली प्रथा थी लेकिन अब बली प्रथा बन्द होने से इस मेले को सात्विक ढंग से मनाया जाता है। तीन दिन के मेले मे पहले दिन कडाकोट पट्टी के आशा देव भूमियाल देवता को रैस से पूजा के बाद भारकोट मे लाया जाता है कहा जाता है कि जब भूमियाल देवता मन्दिर मैं पहुँचता है तब देवता खुद मन्दिर के कपाट खोलते है इसे दऊउगाड कहा जाता है। इस मेले मैं जागर की अहम भूमिका होती है। बरसों से जागर शैली की परम्परा आज भी जारी है। जिसमें महिलाओं का जागर मे विशेष सहयोग होता है। दूसरे दिन केली काटने (केले का पेड़ ) के लिए चोपता चौरी होते हुये तूनेडा गाँव जाते है ।तथा केली को लेकर भारकोट मन्दिर मे लाते है । जिस पर मां नंन्दा की मूर्ति बनायी जाती है रात को जागर सुवह तक लगते हैं। तीसरे दिन सुवह से ही मन्दिर में दूर दूर से दूर भक्तों की भीड माँ के दर्शन के लिए लगती है।13644106_1151722311545606_243399835_n13644249_1151722304878940_656615039_n दिन मे घोडा, हाथी कार्यक्रम किया जाता है । तथा शाम की माँ नन्दा को सारे भक्तगण खासतौर पर ध्याणियो और गांवो की महिलाओं द्वारा कैलाश को विदाई दी जाती है। इस अवसर पर सारी महिलाएँ व भक्तौ की आखो से आँसू रोके नही रूकते है। आज जैसे ही नंदा की डोली कैलाश के लिए रवाना हुयी सारी ध्याणिया और महिलाये फफक कर रोने लगी। और नंदा को कैलाश की ओर विदा किया। जब नंदा कैलाश को रवाना होती है तो बारिश भी शुरू हो जाती है। सदियो से ये परम्परा चली आ रही है। कल चौथे दिन महायज्ञ के साथ व्रहमभोजन के वाद भूमियाल देवता को मूल मन्दिर रैस भेज कर मेले को समापन होता है । भूपेन्द्र सिह मेहरा, सोल्टा और चोपता के पण्डित पुजारी सन्दीप सती जगदीश प्रसाद सती, त्रिलोक सिंह, वलवन्त सिह, सुजान सिह, चरण सिंह, आदि लोगों का कहना है कि बरसों से उनके यहाँ ये परम्परा चली आ रही है। जो यहाँ की सांस्कृतिक पहचान है।

  • GROUND 0

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

जोशीमठ : कलयुग के पारिजात अमर कल्प वृक्ष को हुए 2500 साल

संजय कुंवर / जोशीमठ कल्प बृक्ष एक प्राचीन