माघ मेला : खाली सीटों को गाना सुनाते-सुनाते आखिरकार सोनिया आनंद भी निराश हो गई

माघ मेला : खाली सीटों को गाना सुनाते-सुनाते आखिरकार सोनिया आनंद भी निराश हो गई

 उत्तर की काशी कहे जाने वाले उत्तरकाशी में इन दिनों पौराणिक माघ मेला चल रहा है । बावजूद इसके मेले में वो रौनक देखने का नहीं मिल रही है, जो विगत वर्षों में देखी जाती थी । कारण आचार संहिता और तमाम कारणों से जनप्रतिनिधियों और खासकर आयोजक संस्था जिला पंचायत को मेले से दूर रखना ।

  • आशीष मिश्रा

उत्तरकाशी । माघ मेले का दूसरा दिन । सारेगामापा की विजेता सोनिया आनंद का शो । मंच पर सोनिया आनंद, लेकिन दर्शक दीर्घा में सीटें खाली । सोनिया आनंद खुद को और सीटों पर बैठे कुछेक दर्शकों को माइक पर दिलासा देती हैं, कि आप ये न समझें कि दर्शक नहीं हैं । हमारे लिए एक-एक दर्शक एक लाख के बराबर है । आखिर हो भी क्यों नहीं , वहीं सोनिया आनंद जो जब सारेगामापा में गाती थी, तो पूरा हिंदुस्तान देखता था, लेकिन यहां तो पूरा क्या पांच प्रतिशत  उत्तरकाशी भी मौजूद नहीं था । इसका सोनिया आनंद के शो पर भी सीधा असर दिखाई दिया । सोनिया आनंद और उनकी टीम अपनी रौ में नहीं दिखाई दी । बस कॉनटेक्ट था, तो कार्यक्रम पूरा करना था । यही औपचारिक मजबूरी पूरे कार्यक्रम के दौरान दिखाई दी ।IMG_0817

आखिर ऐंसा हुआ तो हुआ क्यों ? माघ मेला पौराणिक मेला रहा है । ये उत्तरकाशी के जन-जीवन में रचा-बसा मेला है । दूर-दराज के गावों से भले ही पूरे साल कोई उत्तरकाशी जिला मुख्यालय न आए, लेकिन जनवरी में आयोजित होने वाले माघ मेले में, कंपकंपाती ठंड, बारिश के बावजूद लोग जरूर पहुंचते थे । आखिर साल भर में एक बार लगने वाले वाला माघ मेला गंगा घाटी और यमुनाघाटी में बंटे उत्तरकाशी जिले का एकमात्र सांसकृतिक और व्यापारिक गतिविधियों के साथ ही आपसी मेल-मिलाप का  केंद्र रहा है । लेकिन, इस बार चुनाव का नहीं,  आचार संहिता और अहम ब्रहमास्मी का ग्रहण इस माघ मेले को ले डूबा ।IMG_0815

जिला पंचायत और प्रशासन में सामंजस्य बैठाने की कोशिश तक नहीं की गई । लिहाजा, जिला पंचायत में जिला पंचायत अध्यक्ष समेत पूरे जिले का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिनिधियों को दरकिनार कर दिया गया । सालों से माघ मेला आयोजित करते आ रहे लोगों, जनप्रतिनिधियों से मेले के आयेाजन को लेकर राय-मशविरा तक नहीं किया गया । आचार संहिता में जनप्रतिनिधि मेले में सामान्य नागरिक के तौर पर तो प्रतिभाग कर सकते हैं, लेकिन बतौर जनप्रतिनिधि नहीं । लिहाजा, आयोजक संस्था जिला पंचायत और प्रशासन के बीच कड़ी का काम करता है जिला पंचायत के अधिशासी अधिकारी/अपर मुख्य अधिकारी । लेकिन, सबसे फिसडडी साबित हुए अपर मुख्य अधिकारी । अपर मुख्य अधिकारी खुद मेले में दूर-दूर तक नजर नहीं आते । एक उदाहरण देखिए कि औपचारिकता के लिए माघ मेले के बाव्रजर तो छपवाए गए, लेकिन लोगों का बांटे नहीं गए। यहां तक की अधिकांश पत्रकारों तक को माघ मेले के बाउ्रजर नहीं बांटे गए । सूचना विभाग में बिना बताए माघ मेले के बा्उजर डाल दिए गए । आम जनता में प्रचार-प्रसार तो दूर की बात है ।IMG_0811

माघ मेले में लगने वाले स्टॉल और दुकानों में भी जमकर लूटबाजारी चल रही है । बारह हजार की दुकान और दस हजार की फड़, पैंतीस हजार से लेकर बीस हजार रूपए तक में बेची जा रही है । लेकिन, सुनने वाला कोई नहीं । प्रशासन चुनाव की व्यवस्थाओं में व्यस्त है । जनप्रतिनिधि किनारा किए हुए हैं, तो सुने तो सुने कौन ? लिहाजा, राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट । माघ मेला हप्ते भर बाद समाप्त हो जाएगा, लेकिन इसके दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव आखिरकार आम जनता को ही भुगतने होंगे ।

  • टीम GROUND 0

 

 

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