वीसी दरबान सिंह नेगी : गैरों नें दिया अपने देश का सर्वोच्च सम्मान ‘विक्टोरिया क्रॉस’ और अपने मुल्क ने भुला दिया

वीसी दरबान सिंह नेगी : गैरों नें दिया अपने देश का सर्वोच्च सम्मान ‘विक्टोरिया क्रॉस’ और अपने मुल्क ने भुला दिया

  •  संजय चौहान / चमोली

(लोकसंस्कृति/बोली भाषा/ जनसरोकारों की – ३५ वीं क़िस्त)

उत्तराखंड बीरो की तपोभूमि है। यहाँ के योद्धाओं ने अपनी वीरता से पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई है। उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है। यहाँ के हर गांव का सपूत देश की सरहदों की हिफाजत में तैनात है। चमोली जनपद के देवाल ब्लाक में सवाड गांव, घाट ब्लाक में पगनों गांव, दशोली ब्लाक में लुंहा गांव के हर घर से एक सदस्य भारतीय सेना का हिस्सा हैं। जबकि नारायणबगड़ ब्लाक की पूरी कड़ाकोट पट्टी के दर्जनों गाँव के लोगों की वीरता को पूरा विश्व आज भी सैल्यूट करता है।

आज GROUND 0 से इसी कड़ाकोट पट्टी के कफारतीर गांव के वीर योद्धा प्रथम विक्टोरिया क्रॉस नायक दरबान सिंह नेगी जी की बीरता की दास्तान से आपको रूबरू करवातें हैं।
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विक्टोरिया क्रॉस सम्मान मिलने के 103 वीं वर्षगाँठ पर विशेष)

पिंडर नदी के दायीं और अव्यवस्थित है कड़ाकोट पट्टी। लभगग दो दर्जन से भी अधिक ग्राम सभाओं का पूरा परिक्षेत्र बरसों से अपने शौर्य, पराक्रम, सांस्कृतिक विरासत के कारण देश ही नहीं विश्व में अपनी चमक बिखेरे हुए है। यहाँ के सपूतों ने प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध, लेकर वर्तमान समय तक जिस भी मोर्चे की जिम्मेदारी दी गई उसे बखूबी निभाया है। इस पट्टी में एक गाँव है कफारतीर जो पहले थराली और वर्तमान में नारयणबगड ब्लाक के अंतर्गत आता है।

4 मार्च 1883 को कफारतीर गांव के कलम सिंह नेगी जी के घर में वीर योद्धा प्रथम विक्टोरिया क्रॉस नायक दरबान सिंह नेगी का जन्म हुआ था। ३ बहिनों और दो भाइयों में ये दूसरे नम्बर के थे। उस दौरान पूरी कड़ाकोट पट्टी सहित पिंडर घाटी में कोई भी विद्यालय नहीं था। इसलिए अधिकतर लोगों शिक्षा और स्कूल से महरूम थे। जबकि अन्य सुविधाएं न के बराबर थी। विषम परस्थितियों के बाबजूद भी यहाँ के लोगों में मात्रभूमि की रक्षा का जज्बा और जूनून आज भी देखने लायक है। बचपन से ही दरबान सिंह नेगी ने लोगों से सेना की वीरता की कहानिया सुनी थी। जिससे वे बेहद प्रभावित थे और मन ही मन वे सेना में जाना चाहते थे। ४ मार्च १९०२ को वे महज १९ साल की उम्र में ३९ गढ़वाल राइफल्स में बतौर राइफल मेन के रूप में भर्ती हो गये। और प्रशिक्षण के बाद प्रथम बटालियन की ए कंपनी में लैंसडाउन में नियुक्त हो गये। १९०५ से लेकर १९१२ तक वे विभिन्न अहम जगह नियुक्त हुए। २० अगस्त १९१४ को इनकी बटालियन लैंसडाउन से करांची के लिए निकली। जहाँ से इन्हें प्रथम विश्व युद्ध में यूरोपियन फ्रंट में शामिल होने के लिये फ़्रांस पहुंचना था। जहाँ इनका स्वागत बारिश और बंदूक की गोलियों से हुआ। २ नवम्बर तक एक मुटभेड में इन्होने जर्मन सैनिकों को भागने पर मजबूर कर दिया और उन्हें वहां से खदेड़ा जबकि कई सैनिकों को बंदी बनाया।

२३ नवम्बर को इनकी बटालियन को फेस्तुबर्त में जर्मनों द्वारा कब्जे में किये गये मोर्चे को पुनः हासिल करना था। इस मोर्चे को अपने कब्जे में करने के सारे प्रयास असफल हो रहे थे। जर्मन सेना ने मोर्चे के एक हिस्से को चारों और से घेर लिया था। इसी बीच गढ़वाली बटालियन ने मोर्चे को अपने हाथ में लेते हुए एक किनारे से आगे बढ़ना शुरू किया और २४ नवम्बर की सुबह ३ बजे से बटालियन आगे बढने लगी। दुश्मनों को पीछे धकेलती रही इस दौरान दुश्मनों के नियंत्रण में सुरंग को भी फतह करने में सफल रही। जिसमे दरबान सिंह नेगी सबसे आगे थे। उन्होनों दुश्मनों का डटकर सामना किया। उन्होंने कई दुश्मनों को मौत की नींद सुलझा दिया था। वे आगे बढ़ते रहे। इस दौरान उनके सिर पर दो जगह और बांह में एक जगह गोली लगने से घाव हो गया था। जिससे अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा था। फिर भी दरबान सिंह नेगी ने लड़ाई जारी रखी और विजय प्राप्त करके ही दम लिया। जब लड़ाई खत्म हुई तो हर कोई दरबान सिंह नेगी की वीरता और पराक्रम को देख हतप्रभ था। दरबान सिंह नेगी ने अपनी जान की परवाह न करते हुये अकेले ही जर्मन सेना पर भारी पडे थे। इस दौरन दरबान सिंह सिर से लेकर पाँव तक खून से लथपथ थे। युद्ध के बाद उन्हें उपचार के लिए भर्ती किया गया।

युद्ध में दरबान सिंह नेगी के अदम्य शौर्य, वीरता व पराक्रम की चारों और प्रशंसा होने लगी। जिससे गढवाली बटालियन ख्याति विश्व में फैल गयी। दरबान सिंह नेगी की वीरता से प्रभावित होकर 05 दिसम्बर 1914 को किंग जॉर्ज पंचम ने परम्पराओं व प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए लंदन के पैलेस एवं देश की सीमाओं से बाहर मित्र राष्ट्र फ्रांस के युद्ध के मैदान में स्वयं जाकर दरबान सिंह नेगी को देश का सर्वोच्च सम्मान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया।

विक्टोरिया क्रॉस देने के लिए प्रोटोकॉल और परम्परायें ही नहीं तोड़ी गयी बल्कि उन्हें विक्टोरिया क्रॉस देने के 2 दिन बाद विक्टोरिया क्रॉस देने की राजाज्ञा जारी करना भी गोपनीयता के हिसाब से अद्वितीय घटना है। जिसमें उनकी प्रशस्ति में लिखा है—
“23-24 नवंबर की रात, फ्रांस के फेस्तुबर्त के निकट जब रेजिमेंट दुश्मन से अपनी खाइयों को वापस लेने का प्रयास कर रही थी उस दौरान, और दो बार सिर और बांह में घाव लगने और निकट से हो रही राइफलों की भारी गोली-बारी और बमों के धमाके के बीच होने के बावजूद खाइयों में घुसकर उन्हें जर्मन सैनिकों से मुक्त कराने में दिखाई गई उनकी अनुपम वीरता के लिए”

जार्ज पंचम दरबान सिंह नेगी से इतने प्रभावित हुए उनसे दो चीजें मांगने को कहा। दरबान सिंह नें कर्णप्रयाग में मिडिल स्कूल और दूसरा हरिद्वार-ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलवे लाइन की मांग जार्ज पंचम के सामनें रखी।दोनों मांगें फ्रांस की धरती पर ही किंग जॉर्ज पंचम ने स्वीकार कर ली। सन 1914 से सन 1918 तक प्रथम विश्व युद्ध चला। युद्ध के अंतिम समय में 26 अक्टूबर 1918 को कर्णप्रयाग में वार मेमोरियल एंग्लो वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल की स्थापना हुई। जिसके उदघाटन के लिए गढ़वाल के डिप्टी कमिश्नर जोसेफ क्ले अपनी पत्नी सहित पहुँचे थे जबकि रेलवे लाइन का भी सर्वे सन 1919 से सन 1924 के बीच पूरा कर लिया गया था।
24 जून 1950 को सूबेदार बहादुर, दरवान सिंह नेगी विक्टोरिया क्राॅस नें अपनें पैतृक गाँव कफारतीर में अंतिम सांसे ली।

ब्रिटिश सरकार नें दरबान सिंह नेगी को ‘बहादुर’ की उपाधि और सन 1921 में प्रथम विश्व युद्ध में गढ़वाल राइफल्स की विशिष्ट सेवाओं व अद्वितीय शौर्य के लिए सम्राट ने “रॉयल” के खिताब से सम्मानित किया।उत्तराखंड के लैंसडाउन स्थित गढ़वाल राइफल्स के रेजिमेंटल म्यूजियम का नाम उनके सम्मान में उनके नाम पर रखा गया है।

वी० सी० दरबान सिंह नेगी के गाँव कफारतीर को है 103 सालों से अच्छे दिनों का इंतजार!
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05 दिसम्बर 1914 को कफारतीर गाँव के दरबान सिंह नेगी को विक्टोरिया क्राॅस सम्मान दिया गया था। आज 103 साल बाद भी उनका गाँव अच्छे दिनों की बाट जोह रहा है। गाँव में आजादी के 69 साल बाद पिछले साल बमुश्किल से सड़क पहुंच पाई। जिसकी स्थिति भी दयनीय बनी है। नलगांव से कफारतीर गाँव को जोडने वाली सड़क भी कछुवा गति से बन रही है। जबकि गाँव की पेयजल, स्वास्थ्य, विधुत और दूरसंचार व्यवस्था भगवान भरोसे चल रही है। कफारतीर गाँव की ग्राम प्रधान दुर्गा देवी कहती हैं कि पूरे विश्व में देश का नाम रोशन करने वाले सूबेदार बहादुर, दरवान सिंह नेगी विक्टोरिया क्राॅस का गाँव आज भी मूलभूत सुविधाओं की बाट जोह रहा है। जो कि बेहद दुःखद है।

वीसी दरबान सिंह नेगी की मांग पर 26 अक्टूबर 1918 को कर्णप्रयाग में स्थापित वार मेमोरियल एंग्लो वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल के 100 वर्ष पूरे होने पर स्थानीय लोगों और स्कूल से पढ़ें छात्रों नें मिलकर वार मेमोरियल राजकीय इन्टर कालेज कर्णप्रयाग शताब्दी समारोह समिति गठित की है। जो 26 अक्तूबर 2017 से 29 अक्तूबर 2018 तक पूरे साल शताब्दी समारोह का आरोजन कर रही है। वार मेमोरियल राजकीय इन्टर कालेज कर्णप्रयाग शताब्दी समारोह समिति के अध्यक्ष हरीश पुजारी और केन्द्रीय महासचिव भुवन नौटियाल का कहना है कि समिति 26 अक्तूबर 2017 से 29 अक्तूबर 2018 तक पूरे साल शताब्दी समारोह का भव्य आयोजन कर रही है। जिसमें विभिन्न कार्यक्रम हो रहे हैं। इस बार नंदासैण मेला और गौचर मेला भी वीसी दरबान सिंह को समर्पित थे। पूरे साल शताब्दी समारोह में पूर्व छात्रों, शिक्षकों तथा सैनिकों के सम्मेलन, वृक्षारोपण, खेल-कूद, सांस्कृतिक, निबंध, वाद-विवाद, चित्रकला आदि प्रतियोगिताओं के साथ-साथ सेना के सांस्कृतिक दल, स्वास्थ्य परीक्षण शिविर, तीनों सेनाओं की भर्ती मेला आकर्षण का केंद्र बनेंगे।

उन्होंने कहा की कफ़ारतीर को आदर्श गाँव घोषित किया जाय, वार मेमोरियल की स्थापना हो तथा वीसी दरबान सिंह के पैतृक घर को संग्रहालय बनाया जाय।वीसी दरबान सिंह की स्मृति में बड़े संस्थान की स्थापना करने, प्रथम विश्व युद्ध से संबन्धित फोटो, फिल्म, साहित्य प्रदर्शनी, वार मेमोरियल जीआईसी कर्णप्रयाग को रक्षा मंत्रालय के अधीन नर्सरी से इंटर तक अंग्रेजी माध्यम का कॉलेज बनाने सहित विभिन्न मांगो के मांगपत्र को समिति द्वारा उत्तराखंड सरकार, भारत सरकार को सौंपा गया है।
उन्होंने कहा कि आज 05 दिसम्बर को गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंटल सेन्टर लैन्सडाउन में वी०सी० दरबान सिंह नेगी सम्मान व विकास दिवस भव्य रूप से आयोजित हो रहा है। जिसमें शहीदों को श्रद्धांजलि देनें के बाद सैनिकों व सैन्य अधिकारियों के साथ वी० सी० दरबान सिंह नेगी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर सूचनाओं को साझा करेंगे। प्रथम विश्व युद्ध के 103 वर्ष के बाद संभवतः यह पहला मौका होगा जब रेजिमेन्ट सेन्टर में उनकी शौर्य गाथा से आसमान गुंजायमान होगा।

वास्तव मे देखा जाय तो दरबान सिंह नेगी नें प्रथम विश्व में जिस तरह से अदम्य साहस, वीरता का परिचय दिया उससे भारत सहित हर उत्तराखंड गौरवान्वित हुआ। लेकिन दुःखद स्थिति ये है विक्टोरिया क्रास मिलने के 103 बरस बाद भी इस बीर योद्धा के गाँव की सुध लेने को हुकूमत के पास समय नहीं हैं।

  • TEAM GROUND 0  सैल्यूट करती है  वीसी दरबान सिंह नेगी को।

1 Comment

  1. Binod Chandra Kukreti

    Our SALUTES to the GREAT GARHWALI !!
    our humble Pranam to the Great Souls !!

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