भागवत कथा सुनने मात्र से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते है। – आचार्य शिव प्रसाद ममगांई

भागवत कथा सुनने मात्र से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते है। – आचार्य शिव प्रसाद ममगांई

बड़कोट। भागवत कथा सुनने मात्र से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते है । आत्मा का शुद्विघ के लिए श्रीमद् भागवत गीता का पाठ करना जरूरी है । वर्तमान समय में मनुष्य मोहमाया में फंसकर रह गया है । जाने अनजाने में मनुष्य कई बार पाप कर जाता है इसलिए नित्य गीता पाठ करना चाहिए । यह बात बड़कोट नगर पालिका कें रतुड़ी स्टे्ट सभागार में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में ज्योतिष पीठ श्रीबद्रीनाथ व्यास पद से अंलकृत प्रसिद्व कथा वाचक आचार्य शिव प्रसाद ममगाॅई जी के श्रीमुख से भगवत सप्ताह के चतुर्थ दिवस रविवार को श्रीवली महाराज ,वामन अवतार और श्रीकृष्ण जन्म कथा में उन्होने श्रद्वालुओं से कही । उन्होने कहा कि इस भागमभाग भरी जिंदगी में कुछ समय प्रभु के लिए भी निकलना चाहिए ताकी भगवान का नाम लिया जा सके । जिस स्थान पर भागवत कथा का वाचन होता है वहां पर भक्ति अपने आप ही पहंुच जाती है , कलयुग में केवल भक्ति ही जीवन का सार है और भक्ति से भगवान वहीभूत हो जाते है , कथा सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करने वाली मोक्षदायिनी हैै। श्री व्यास पीठ से कथा श्रवण में वामन अवतार भगवान श्री कृष्ण कि अनुपम अद्वुत आकर्षण कृष्ण जन्म कथा सनाने के साथ ’’नंद के घर आनंद भयों ,जय कन्हैया लाल की’’ के भजन से श्रद्वालु झूमने लगें । उन्होने कहा कि योगी को चाहिए कि वह सदैव अपने शरीर , मन और आत्मा को परेमश्वर मेें लगाए । एकान्त स्थान मेें रहे और बड़ी सावधानी के साथ अपने मन को वश में करें , उसे समस्त आकांक्षाओं और संग्रह भाव की इच्छा से मुक्त होना चाहिए। उन्होने कहा कि मनुष्य निष्कपट , हितैषियों , प्रिय , मित्रों , तटस्थ ,मध्यस्थों, ईष्र्यालु , शत्रु, पुण्य आत्माओं और पापियों को समान भाव से देखता है तो वह और भी उन्नत माना जाता है । निर्भयता , आत्म शुद्विघ , आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन , दान, आत्म संयम , यज्ञ, परायणता, वेदाध्ययन,तपस्या , सरलता , अहिंसा , सत्यता , को्रधविहीनता , त्याग, शान्ति, छिद्रान्वेषण में अरूचि , समस्य जीवों पर करूणा, लोभ, विहीनता, भद्रता , लज्जा, संकल्प, तेज , क्षमा, धैर्य , पवित्रता, ईष्र्या ,सम्मान की अभिलाषा से मुक्ति यह सारे दिव्य गुण हैं जो देवी प्रगति से संपन्न देवतुल्य पुरूषों में पाए जाते है। उत्तराखण्ड सहित देश भर में 1200 से अधिक कथा का प्रवचन कर चुके श्री ममगांई जी ने कहा कि उत्तराखण्ड में आस्थाओं के विभिन्न केन्द्र है यहां पर प्रवेश करने मात्र से स्वस्थ चित्त वृत्ति की अनुभूति होती है। वैसे मुनष्य की वाणी स्वर मधुर हो तो पूर्णता जीवन में आती है। उन्होने कहा कि रत्न चाहिए तो पुरूसार्थ करों । गज और ग्राह की कथा सुनाते हुए कथा वाचक ने कहा कि यह संसार ही त्रिगुण से बना हुआ त्रिकुट पर्वत है । जीवन ही वह गजराज है जो इस संसार रूपी सरोवर में सुख दुख भोग रूपी स्नान करता है । इसी संसार रूपी सरोवर में ग्राह रूपी मृत्यू भी रहती है । एक बार ग्राह ने गज का ऐसा पैर पकड़ा की गजराज ने अपने को निर्बल पाया । जब परिवार सगे सम्बन्धियों से भी मद्द न पुरी देख कर गजराज ने भगवान को पुकारा तो प्रभु तत क्षण आकर जगराज का उद्वार किया। इस मौके पर आचार्य मुन्शीराम, हरीशरण , रमेश प्रसाद , वृन्दा प्रसाद, सुमित थपलियाल, सन्दीप , सौरभ, अशोक , सचिन , सन्दीप आयोजक समाजसेवी विशालमणी रतुड़ी , श्रीमती सुन्दरा देवी , विघा सागर ,श्रीमती दीक्षा , भगवती , श्रीमती ऐश्वार्य , उन्नति , नैतिक , वैभवी, वेदा, ओम प्रकाश , मरारी लाल, आशाराम , हर्षपति , प्रभात , ममता , शैलेन्द्र रतुड़ी , उमा , वाचस्पति , नरोत्तम प्रसाद , प्रकाश , सहित सैकड़ो लोग मौजूद थे।
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