पौड़ी गढ़वाल राठ क्षेत्र का प्रसिद्ध बूंखाल कालिंका कल

पौड़ी गढ़वाल राठ क्षेत्र का प्रसिद्ध बूंखाल कालिंका कल

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 ●   कैलाश थपलियाल, पौड़ी

जिला पौड़ी गढ़वाल के राठ क्षेत्र का प्रसिद्ध बूंखाल कालिंका मेला कल है  क्षेत्र में हफ्ते भर पहले से ही प्रवासी ग्रामीणों के मेले में शिरकत करने को आने से पलायन के चलते वीरान पड़े गॉंवों में आजकल भीड़ से रौनक हो रखी है इन गॉंवों में आजकल ग्रामीण ढोल-दमाऊ  व डौंर -थाली की थाप पर  माँ कालिंका देवी की पूजा अर्चना करने पर लगे हुए है ! बूंखाल कालिंका मंदिर के बारे में पुरानी मान्यता है कि बूंखाल गॉंव के समीप मलुण्ड गॉंव की जमीन में चोपड़ा गॉंव के बच्चे अपने जानवरों को चुगाने गए थे,जहाँ वे बच्चे लुका-छिपी का खेल खेलने लगे जिसमें उन्होंने एक लड़की को गड्ढे में पठाल रखकर छुपा दिया बाद में वे उसे पठाल हटाकर निकालना भूल गए, बाद में उन्हें जब याद आया तब तक वो लड़की दम घुटने से मर चुकी थी ,तब उस लड़की ने सपने में अपनी माँ से कहा कि मैं देवी बन चुकी हूँ वहां पर मेरा मंदिर बनाओ, तब क्षेत्रीय ग्रामीणों ने मंदिर बनाया व देवी की पत्थर की मूर्ति स्थापित की ! ग्रामीणों का कहना है कि पहले यह मूर्ति संक्रामक बीमारी व अन्य आपदा आने से ही पूर्व ही ग्रामीणों को आगाह कर देती थी , लेकिन 1791में जब गोरखा आक्रमण के समय गोरखा सैनिक इस क्षेत्र में प्रवेश कर रहे थे तो देवी ने आवाज देकर ग्रामीणो को आगाह किया, जिसकी भनक गोरखाओं को लग गयी और उन्होंने देवी की मूर्ति का सिर काटकर उसे उल्टा करके दफना दिया तथा गोरखा देवी माँ का सिर को अपने साथ ले गए  जिसकी पूजा आज भी पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल में होती है

    ” डोली में लाते है  माँ कालिंका को ग्रामीण”

बूंखाल कालिंका माँ मंदिर के पुजारी गोदा गॉंव की गोदियाल जाति के ब्राह्मण होते है , स्थानीय ग्रामीण नरेश उनियाल ने बताया कि मलुण्ड, गोदा, छोया, चौंरीखाल,कोटी, पाटुली, कनाकोट,पिनाकोट, मरगॉंव के ग्रामीण देवी की डोली को ढोल-दमाऊ की थाप पर पांडव नृत्य करते हुए देवी जागरों को गाते हुए बूंखाल में माँ के मंदिर में लाकर पूजा अर्चना करते है

              “सतनाजा चढाने की भी परम्परा”
माँ कालिंका के मंदिर में सरसों का तेल व सतनाजा(सात अनाज का मिश्रण) भी चढ़ाया जाता है,जिनकी मनोकामना पूर्ण होती है वे माँ के मंदिर में घण्टियाँ भी चढ़ाते है

   ”  कैसे पहुंचे और कैसे दर्शन करें माँ कालिंका के मंदिर के”
> माँ कालिंका के मंदिर में आप जिला मुख्यालय पौड़ी से सड़क मार्ग से 50 किमी0 माण्डाखाल ,खिर्सू होते हुए चौरीखाल पहुंचकर मात्र 200 मीटर पैदल चलकर तथा अगर आप वाया कोटद्वार आ रहे है तो आप पाबौ ,पैठाणी होकर सीधे 135 किमी0 सड़क मार्ग से सीधे माँ बूंखाल कालिंका मंदिर तक पहुँच सकते है ! चौरीखाल पहुँचने के बाद मंदिर जाने वाले मार्ग में पड़ने वाले पहले मंदिर में श्रीफल व सतनाजा भेंट के साथ चढ़ाये , कुछ सतनाजा मुख्य मंदिर के लिए भी बचाकर रखे तथा मुख्य मंदिर में देवी का खप्पर जहाँ पर देवी की मूर्ति को गोरखाओं ने दफनाया था में सतनाजा और सरसों का तेल चढ़ाये !

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