वो गांव जहां लोग आज भी आदिम जीवन बिताते हैं

वो गांव जहां लोग आज भी आदिम जीवन बिताते हैं

- in अन्य
161
0

● नीरज उत्तराखंडी

जनपद उत्तरकाशी के सीमांत गाँव गंगाड, पवाणी और ओसला में जिला अधिकारी आशीष चौहान के साथ भ्रमण करने का अवसर मिला। जहां देखने को मिला कि सीमांतवासी आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में कष्ट और जोखिम भरा जीवन जीने को मजबूर है।
ओसला गाँव की यदि हम बात करें तो लोग यहाँ आज भी ग्रामीण आदिम जीवन जीने को मजबूर है । यहां 150 परिवार निवास करते हैं।

यातायात की सुविधा न होने से तालुका वन मोटर मार्ग से सुपिन नदी के छोर से होते हुए 14 किमी की खड़ी चढ़ाई की पगडंडी के सहारे गाँव पहुँचना पडता है ।गाँव में पेयजल की खुली लाइनें तो दिखी लेकिन नलों से पानी नदारद था एक लाईन में पानी जरूर दिखा जो जगह जगह लीकेज हो रहा था।

ग्रामीण बता रहे थे कि आज ही पहली बार पाइप लाइन में पानी आ रहा है।लोग गाँव में बह रहे प्राकृतिक स्रोत से पानी भरते और ढोते हैं ।जो इस बात का एक पुख्ता प्रमाण था कि यहां पेयजल योजनाएं केवल ठेकेदारों और विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की उदर पूर्ति के लिए केवल कागजों में बनाईं जाती है।

हमारे सामने एक यक्ष प्रश्न था कि जब जिले का 75 प्रतिशत वजट मोरी ब्लाक में खर्च किया जाता है तो वह धरातल पर क्यों नहीं पहुँच पाता? सरकार की समाज उपयोगी कल्याणकारी योजनाएं बीपीएल कार्डऔर पेंशन,जैसी योजनाएं पात्र लाभार्थियों तक नहीं पहुँच पा रही है ।

जिले को शौचमुक्त भले ही घोषित कर दिया गया है लेकिन यहाँ अधिकांश ग्रामीणों के पास शौचालय नहीं हैं । राजकीय सहायता भी समाज की अंतिम पंक्ति पर बैठे लोगों तक नहीं पहुँच पा रही है ।

सरकारी सहायता पर बिचौलियों ने कब्जा कर लिया है । अपने ही गाँव के कर्मचारी अपने गाँव में ड्यूटी नहीं करना चाहते इससे बडी कष्ट और दुःखाई बात क्या हो सकती है? कुछ लोग स्थानीय भाषा में यह कहते भी सुने गये कि चलो डीएम साहब के आने से आज स्कूल तो खुल गये।

और नलों में पानी चला और वर्षों पूर्व बिछाई गई बिजली की तारों में करंट दौड़ा। सीमांत गाँवों में शिक्षा व्यवस्था बदहाल है।स्वास्थ्य सेवाएं मृत पड़ी है।

ग्रामीणों ने बताया कि स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में अब तक चार गर्भवती महिलाएं दम तोड़ चुकी है।पवाणी गाँव में स्वास्थ्य की कोई सुविधा नहीं है गंगाड गाँव में खोला गया ऐलोपैथिक अस्पताल बंद पड़ा है।

यहां सुखद और राहत की बात यह है कि एक अध्यापक जो फार्मेसी का डिप्लोमा किये हैं पढाई के साथ-साथ ग्रामीणों को दवाई देकर उनके स्वास्थ्य का भी ध्यान रखते है।सीमांत में पग पग में जोखिम है और यह जोखिम झेलना ग्रामीणों की नियति बन गई है।

● TEAM GROUND 0

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

मसूरी छावनी परिषदों के सभासदों के बीच जमकर चले लाठी डंडे

● सुनील सोनकर मसूरी लंढौर छावनी परिशद के