…..जीना इसी का नाम है…

…..जीना इसी का नाम है…

देवलीभणी गाँव (गुप्तकाशी),
केदारनाथ आपदा 5 साल….!

देवली भणी गांव की महिलाओं ने लिखी विकास की नई इबारत।

.रिपोर्ट मधुसूदन जोशी
भयंकर विपदा में देवली भणी के लगभग पचास लोगों के मारे जाने के बाद इस गांव को विधवाओं का गांव कहा जाने लगा।
लेकिन 16 और 17 जून को साल 2013 में केदारनाथ घाटी में मंदाकिनी नदी ने प्रलयकारी विनाश किया था। इस तबाही में पचास हजार लोग लापता हुए. वहीं लाखों लोगों को सेना ने बचाया. इस भयंकर आपदा का शिकार घाटी में स्थित देवली भणी गांव भी हुआ। जहां के 50 लोग इस आपदा में मारे गये थे, लेकिन गांव के लोगों की मेहनत ने गांव की तस्वीर बदलकर रख दी है.
गांव के लोगों की जीवटता केदारनाथ घाटी में रहने वाले लोगों से सीखी जा सकता है. भयंकर विपदा में देवली भणी के लगभग पचास लोगों के मारे जाने के बाद इस गांव को विधवाओं का गांव कहा जाने लगा. गांव के सारे पुरुष काल के गाल में समा गये थे, लेकिन गांव की महिलाओं ने अपनी मेहनत से गांव की सूरत बदलने के साथ आत्मनिर्भरता की एक नई इबारत लिख डाली.
गांव के रहने वाले हरिकृष्ण बगवाड़ी ने मंदाकिनी महिला समिति बनाकर उससे गांव की महिलाओं को जोड़ा है. 110 महिलाओं के इस समूह में महिलाएं सूत कातने, चरखा चलाने और कपड़े की बुनाई तक का काम करती हैं।बुनाई के अलावा खेतों में जाकर हरियाली को संभालने से लेकर खेत की मिट्टी को भी अपने कंधे के बल पर उर्वरा बना रही हैं।
देवली भणी गांव की महिलाओं के चेहरे पर अपनों के खोने का दर्द आज भी छलकता है, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत की बदौलत गांव की तस्वीर बदल दी है. उन्होंने ये साबित कर दिया है कि विपदा के बाद भी जीवन को सही तरीके से जारी रहने का नाम जिंदगी है।

TEAM GROUND 0.

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